आज मैं गुनगुनाना चाहता हूँ
पकड़ के आसमान की बांहों को
हवा में झूल जाना चाहता हूँ
आज मैं गुनगुनाना चाहता हूँ
अब तो मस्ती ही मस्ती छायी है
तेरी नज़रों में, मेरी नज़रों में
इश्क का प्याला तेरी निगाहों से
पी के मैं झूम जाना चाहता हूँ
आज मैं गुनगुनाना चाहता हूँ
ख़्वाब देखे थे जो, हुए पूरे
अब नयी मंज़िल की मैं तलाश में हूँ
तेरे क़दमों से मिला के अपने कदम
मैं बहुत दूर जाना चाहता हूँ
आज मैं गुनगुनाना चाहता हूँ
जब भी सोचा है, तुम्हें सोचा है
जब भी चाहा है, तुम्हें चाहा है
बसा के आंखों में तेरा चेहरा
मैं सब कुछ भूल जाना चाहता हूँ...
आज मैं गुनगुनाना चाहता हूँ
तेरी खुशबु से महक रही है फिजा
तेरी आहट से महक उठता हूँ मैं
डूब कर मैं तेरी मोहब्बत में
तेरे संग जीना-मरना चाहता हूँ
आज मैं गुनगुनाना चाहता हूँ
पकड़ के आसमान की बांहों को
हवा में झूल जाना चाहता हूँ
आज मैं गुनगुनाना चाहता हूँ
Wednesday, April 18, 2007
Tuesday, April 17, 2007
पीने - पिलाने की शाम आ गयी है
नींदें गंवाने की शाम आ गयी है
सर-ए-आम जो जुर्म उन्होने किये थे
सज़ा उनकी अपने ही नाम आ गयी है
जब दिल ने तड़प कर तुम्हें था पुकारा
जब आंखों के रस्ते था दिल में उतारा
जब वक़्त की कुछ हमें ना खबर थी
वोही आज फिर सुबह-ओ-शाम आ गयी है
वही सब हैं मंजर, वही हम , वही तुम
उन्हीं सब नज़रों में हम तुम है गुमसुम
किये थे जो वादे, जो खायी थी क़समें
उन सब को निभाने की शाम आ गयी है
नींदें गंवाने की शाम आ गयी है
सर-ए-आम जो जुर्म उन्होने किये थे
सज़ा उनकी अपने ही नाम आ गयी है
जब दिल ने तड़प कर तुम्हें था पुकारा
जब आंखों के रस्ते था दिल में उतारा
जब वक़्त की कुछ हमें ना खबर थी
वोही आज फिर सुबह-ओ-शाम आ गयी है
वही सब हैं मंजर, वही हम , वही तुम
उन्हीं सब नज़रों में हम तुम है गुमसुम
किये थे जो वादे, जो खायी थी क़समें
उन सब को निभाने की शाम आ गयी है
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