Tuesday, April 17, 2007

पीने - पिलाने की शाम आ गयी है
नींदें गंवाने की शाम आ गयी है

सर-ए-आम जो जुर्म उन्होने किये थे
सज़ा उनकी अपने ही नाम आ गयी है

जब दिल ने तड़प कर तुम्हें था पुकारा
जब आंखों के रस्ते था दिल में उतारा
जब वक़्त की कुछ हमें ना खबर थी
वोही आज फिर सुबह-ओ-शाम आ गयी है

वही सब हैं मंजर, वही हम , वही तुम
उन्हीं सब नज़रों में हम तुम है गुमसुम
किये थे जो वादे, जो खायी थी क़समें
उन सब को निभाने की शाम आ गयी है

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